गोलाबाजार, गोरखपुर: 16 फरवरी 2026
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जनता की शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए तहसील और थाना स्तर पर ‘संपूर्ण समाधान दिवस’ का आयोजन किया जाता है। लेकिन धरातल पर इसकी हकीकत कितनी कड़वी है, इसका जीता-जागता उदाहरण गोरखपुर के गोला थाना क्षेत्र के ग्राम सभा हरपुर से सामने आया है। यहाँ के निवासी राम कृपाल सिंह पिछले छह महीनों से न्याय की आस में थाने से तहसील और विकास खंड कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उनकी फाइल एक विभाग से दूसरे विभाग के बीच ‘फुटबॉल’ बनी हुई है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त विवरण के अनुसार, पीड़ित राम कृपाल सिंह का घर विकास खंड उरुवा और थाना गोला क्षेत्र के अंतर्गत आता है। उनके दरवाजे के सामने से ग्राम सभा द्वारा निर्मित एक सार्वजनिक नाली गुजरती है, जो पूरे मोहल्ले की जल निकासी का मुख्य जरिया है। पीड़ित का आरोप है कि उनके विपक्षी ने दबंगई के बल पर नाली के मुख्य चैंबर को पाट दिया है।

चैंबर पाटे जाने के कारण नाली पूरी तरह अवरुद्ध हो गई है। राम कृपाल सिंह के घर के नाबदान का गंदा पानी बाहर नहीं निकल पा रहा है और उनके मुख्य द्वार के पास ही जमा होकर सड़ रहा है। भीषण गंदगी और बदबू के कारण परिवार का जीना मुहाल हो गया है और क्षेत्र में संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ गया है।
विभागों की ‘चकरघिन्नी’ बना पीड़ित
राम कृपाल सिंह की व्यथा किसी फिल्म की कहानी जैसी लगती है, जहाँ एक आम आदमी व्यवस्था के मकड़जाल में उलझकर रह जाता है। पीड़ित ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि पिछले 180 दिनों में उन्होंने शायद ही कोई ऐसा दरवाजा छोड़ा हो जहाँ न्याय की गुहार न लगाई हो।
- विकास खंड कार्यालय (BDO): जब वे ब्लॉक ऑफिस जाते हैं, तो उन्हें यह कहकर तहसील भेज दिया जाता है कि मामला राजस्व और अतिक्रमण का है।
- तहसील (SDM): तहसील पहुँचने पर उपजिलाधिकारी (एसडीएम) उन्हें पुलिस के पास भेज देते हैं ताकि मौके पर शांति व्यवस्था के साथ काम हो सके।
- थाना (Police): जब वे गोला थाने पहुँचते हैं, तो पुलिस मामला विकास कार्य और ग्राम सभा का बताकर पुनः विकास खंड कार्यालय यानी ब्लॉक भेज देती है।
इस ‘त्रिकोणीय’ विभागीय चक्कर में राम कृपाल सिंह की चप्पलें घिस गईं, लेकिन समाधान दिवस पर दी गई शिकायतों का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
कोतवाल का आश्वासन: अब कानूनी कार्रवाई की उम्मीद
इस बार आयोजित समाधान दिवस पर पीड़ित की पीड़ा एक बार फिर अधिकारियों के सामने आई। नवागत कोतवाल एवं समाधान दिवस प्रभारी राकेश रोशन सिंह ने मामले की गंभीरता को समझा। उन्होंने पीड़ित की बात सुनने के बाद एक व्यावहारिक रास्ता सुझाया। कोतवाल ने आश्वासन दिया कि यदि ग्राम सचिव या ग्राम प्रधान के माध्यम से विपक्षी के विरुद्ध थाना में एक औपचारिक प्रार्थना पत्र दिलाया जाए, तो पुलिस तत्काल मुकदमा पंजीकृत कर कड़ी कानूनी कार्रवाई करेगी।
कोतवाल राकेश रोशन सिंह ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक संपत्ति (नाली) को नुकसान पहुँचाना और जल निकासी अवरुद्ध करना एक कानूनी अपराध है। उन्होंने पीड़ित को भरोसा दिलाया कि अब उन्हें भटकना नहीं पड़ेगा और पुलिस बल की मौजूदगी में अवरुद्ध नाली को खुलवाया जाएगा।
गंदगी और बीमारी का बढ़ता प्रकोप
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जल निकासी न होने के कारण रुका हुआ पानी मच्छरों के पनपने का केंद्र बन गया है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है। राम कृपाल सिंह का कहना है कि “हम टैक्स देते हैं और सरकारी नियमों का पालन करते हैं, लेकिन जब हमारी बुनियादी समस्या की बात आती है, तो अधिकारी केवल एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते हैं।”
प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
यह मामला उत्तर प्रदेश शासन के उस दावे पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जिसमें कहा जाता है कि शिकायतों का निस्तारण ‘क्वालिटी’ के साथ किया जा रहा है। यदि एक सार्वजनिक नाली को खुलवाने में प्रशासन को छह महीने का समय लग रहा है, तो जटिल भूमि विवादों का क्या हाल होता होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
समाधान दिवस की सफलता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब राजस्व, पुलिस और विकास खंड के अधिकारी एक साथ बैठकर समन्वय के साथ निर्णय लें, न कि पीड़ित को डाकिया बनाकर एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भेजें।
निष्कर्ष
राम कृपाल सिंह का मामला केवल एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस हर आम आदमी की कहानी है जो व्यवस्था के ढीलेपन का शिकार है। फिलहाल, कोतवाल के आश्वासन के बाद उम्मीद की एक किरण जगी है। अब देखना यह होगा कि ग्राम प्रधान और सचिव इस मामले में कितनी तत्परता दिखाते हैं और क्या 6 महीने से सड़ रहे उस गंदे पानी से पीड़ित परिवार को मुक्ति मिल पाती है या नहीं। प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसे संवेदनशील मामलों में ‘शून्य सहिष्णुता’ अपनाते हुए दोषियों के खिलाफ मिसाल पेश करे।












