बृजनाथ तिवारी की रिपोर्ट
‘वन्दे मातरम्‘… यह केवल एक राष्ट्रीय गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का काव्यात्मक उद्घोष है। बंकिमचन्द्र चटर्जी की यह अमर वाणी धरती को साक्षात् माता के रूप में देखती है। इस गीत के शब्द—सुजलाम्, सुफलाम्, शस्यश्यामलाम्—एक ऐसे भारत का चित्र खींचते हैं जहाँ जल जीवन का पर्याय है, हरियाली आशा का प्रतीक है और भूमि अपनी उदारता से सबका पोषण करती है।
किंतु, आज 26 जनवरी 2026 को जब हम ‘वी द पीपुल ऑफ इंडिया’ (हम भारत के लोग) के नाम पर संविधान का उत्सव मना रहे हैं, तब एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा है। क्या हम आज भी इस माता की उस छवि का संरक्षण कर पा रहे हैं, या हमने अपनी ही गोद में विकास के नाम पर कूड़े के पहाड़ खड़े कर दिए हैं?

सुजलाम्: जल प्रदूषण और चेतना की दरार
गीत में ‘सुजलाम्’ का अर्थ है श्रेष्ठ जलों वाली भूमि। कभी नदियाँ इस राष्ट्र की जीवनदायिनी धमनियां थीं, लेकिन आज उनमें प्रदूषण का विष घुल चुका है। जिन सरिताओं को हमने देवत्व का दर्जा दिया, वे आज प्लास्टिक, घातक रसायनों और हमारी सामूहिक उदासीनता की भेंट चढ़ रही हैं। भूजल का गिरता स्तर और अनियमित वर्षा केवल एक प्राकृतिक संकट नहीं, बल्कि हमारी चेतना की दरार है। जब हम जल का अपमान करते हैं, तब ‘सुजलाम्’ का स्वप्न सूखने लगता है।
सुफलाम्: उपजाऊ धरती और आधुनिक चुनौतियाँ
‘सुफलाम्’ उस उर्वर भूमि की कल्पना है जहाँ अन्न केवल क्षुधा शांत नहीं करता, बल्कि संस्कारों का भी सृजन करता है। आज अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, कंक्रीट के फैलते जंगल और खेती से विमुख होती नई पीढ़ी इस सुफलता को सीधी चुनौती दे रही है। खेत सिकुड़ रहे हैं और अन्नदाता का संघर्ष बढ़ता जा रहा है। हमें विचार करना होगा कि क्या यह वही ‘सुफलाम्’ है जिसका गुणगान हमारा राष्ट्रीय गीत करता है?
मलयजशीतलाम्: प्रदूषित वायु और अशांत प्रकृति
चंदन-सी शीतल हवा (मलयजशीतलाम्), जो मन और पर्यावरण को शांति प्रदान करती थी, आज वायु प्रदूषण से बोझिल हो चुकी है। महानगरों में शुद्ध सांस लेना एक संघर्ष बन गया है और ऋतुओं का चक्र असंतुलित है। शीतलता का स्थान अब औद्योगिक ताप, धुएं और शोर ने ले लिया है। प्रकृति की यह व्याकुलता हमारी विकास की परिभाषा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
सुमधुर भाषिणी: भाषा और संवाद का मानवीय आयाम
गीत का एक और महत्वपूर्ण पहलू है ‘सुमधुर भाषिणी’। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि संस्कृति और संवेदना का सेतु है। आज के डिजिटल युग और सार्वजनिक विमर्श में वह मधुरता लुप्त होती जा रही है। संवाद की जगह आरोपों ने और विनम्रता की जगह उत्तेजना ने ले ली है। जब भाषा कठोर होती है, तो समाज की आत्मा भी कठोर हो जाती है। विभाजन और कटुता के शोर में सुमधुर भाषिणी का स्वर कहीं खो गया है।
निष्कर्ष: जयघोष से आगे बढ़कर उत्तरदायित्व की प्रतिज्ञा
‘वी द पीपुल ऑफ इंडिया’ केवल एक संवैधानिक पंक्ति नहीं, बल्कि एक प्रतिज्ञा है—अपनी धरती को माँ मानने की और उसके प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की। वन्दे मातरम् (Vande Mataram) का वास्तविक अर्थ केवल जयघोष नहीं, बल्कि ‘आत्मावलोकन’ है।
हम उस माता के योग्य संतति तभी कहलाएंगे जब हम कूड़े के पहाड़ों को फिर से हरियाली में बदलेंगे, प्रदूषित वायु को शुद्ध करेंगे और अपनी कटु वाणी को करुणा एवं सुमधुर संवाद में ढालेंगे। तभी यह गीत केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवित सत्य बनेगा। तभी वास्तविक अर्थों में हम कह सकेंगे—वन्दे मातरम्।
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