यह रिपोर्ट बृजनाथ तिवारी की लिखी हुई है
केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक (Triple Talaq) को लेकर बनाए गए सख्त कानून के बावजूद उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के गोला थाना क्षेत्र में एक महिला को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। कोहड़ी बुजुर्ग निवासी नीलोफर खान अपने तीन मासूम बच्चों के साथ पिछले चार दिनों से गोला थाने के चक्कर लगा रही है, लेकिन पुलिस की कथित संवेदनहीनता के कारण अब तक इस गंभीर मामले में मुकदमा दर्ज नहीं हो सका है।

पीड़िता का आरोप है कि उसे न केवल अवैध तरीके से घर से निकाला गया, बल्कि उसके साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गईं।
12 साल का रिश्ता और फिर तीन तलाक का दंश
पीड़िता नीलोफर खान का निकाह 17 दिसंबर 2012 को अफजल खान के साथ हुआ था। उनके तीन बच्चे (13 वर्षीय हस्सान, 11 वर्षीय अलीना और 3 वर्षीय आयजल) हैं। नीलोफर के अनुसार:
- विवाहेत्तर संबंध: उसके पति का संबंध रूमाना शेख नामक महिला से हो गया, जिसके बाद घर में कलह शुरू हुई।
- भ्रूण हत्या का आरोप: पति ने गर्भ में पल रहे बच्चों को जबरन दवा खिलाकर नष्ट करा दिया, जिससे नीलोफर का गर्भपात हो गया।
- अवैध तलाक: 15 जनवरी को पति ने मौखिक रूप से तीन बार ‘तलाक-तलाक-तलाक’ कहकर प्रतिबंधित तीन तलाक दे दिया।
मारपीट कर मासूमों संग घर से निकाला
आरोप है कि जब नीलोफर ने इस अवैध तीन तलाक का विरोध किया, तो उसके पति ने उसे जान से मारने की धमकी दी और मारपीट करते हुए उसे घसीटकर घर से बाहर निकाल दिया। पीड़िता के पिता का देहांत हो चुका है, जिसके कारण मायके में भी उसका कोई सहारा नहीं है। अब वह अपने तीन छोटे बच्चों के साथ कड़ाके की ठंड में सड़कों पर रहने को मजबूर है।
पुलिस की भूमिका पर उठ रहे सवाल
हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार द्वारा तीन तलाक को आपराधिक कृत्य घोषित किए जाने के बावजूद गोला पुलिस मामले को टाल रही है।
- चार दिन का इंतजार: पीड़िता चार दिनों से प्रार्थना पत्र लेकर थाने पहुँच रही है।
- केवल आश्वासन: पुलिस की ओर से उसे केवल आश्वासन मिल रहा है, जबकि मामला भ्रूण हत्या और मारपीट जैसे गंभीर अपराधों से भी जुड़ा है।
- कानून का मजाक: पुलिस की यह सुस्ती महिलाओं की सुरक्षा और तीन तलाक कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है।
निष्कर्ष: क्या मिलेगा नीलोफर को न्याय?
नीलोफर खान का मामला यह दर्शाता है कि कानून बन जाने मात्र से पीड़ित महिलाओं की राह आसान नहीं हुई है, जब तक कि पुलिस प्रशासन संवेदनशील न हो। अब देखना यह है कि उच्चाधिकारियों के संज्ञान लेने के बाद क्या गोला पुलिस इस मामले में कोई कठोर कदम उठाती है या पीड़िता को बच्चों सहित दर-दर भटकना ही पड़ेगा।
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