यह रिपोर्ट बृजनाथ तिवारी की लिखी हुई है
शिशिर की ठिठुरन भरी जड़ता जब अपनी अंतिम सांसें ले रही होती है और चराचर जगत में एक मौन प्रतीक्षा पसरी होती है, तभी प्रकृति के आंगन में एक सूक्ष्म और मादक स्पंदन सुनाई देता है। यह आहट है ऋतुराज बसंत (Basant) की। यह केवल एक ऋतु का परिवर्तन नहीं, बल्कि धरा की धमनियों में नवजीवन का उल्लास बनकर दौड़ने वाला एक उत्सव है। बसंत का आगमन मानव मन में आशाओं के सुरभित निर्झर प्रवाहित कर देता है और चैतन्य का शंखनाद करता है।
गोरखपुर के गोला क्षेत्र सहित संपूर्ण आर्यावर्त में इस ऋतु का स्वागत एक नई ऊर्जा के साथ किया जा रहा है। धूसर पड़ चुके वृक्षों की कोख से जब रक्तिम कोंपलें फूट रही हैं, तो ऐसा आभास हो रहा है मानो वसुंधरा ने विरक्ति का त्याग कर पूर्ण श्रृंगार का संकल्प ले लिया हो।

प्रकृति की चित्रवीथि: सरसों की स्वर्णमयी आभा और कोकिल की कूक
जब हम बसंत की बात करते हैं, तो आंखों के सामने सरसों के खेतों में लहलहाती स्वर्णमयी आभा तैरने लगती है। अमराइयों में कोकिल की विरह-कूक जब पंचम स्वर को छूती है, तब प्रकृति की यह चित्रवीथि साक्षात् काव्य बन जाती है। यहाँ रंग भी हैं, राग भी है और वह गंध भी, जो मन के बंद वातायनों को खोल देती है।
यह वह संधि-काल है जहाँ शीत ऋतु की जड़ता विदा लेती है और कोमल हरियाली के रूप में जीवन का नवोन्मेष प्रस्फुटित होता है। मलयज समीर का स्पर्श अनुभव होते ही हर जीवधारी एक अनकहे उल्लास से भर जाता है। मलय पवन के झोंके न केवल शरीर को शीतलता प्रदान करते हैं, बल्कि विचारों में भी ताजगी का संचार करते हैं।
बसंत पंचमी: विद्या, कला और विवेक का महापर्व
भारत की सांस्कृतिक मेधा में बसंत का यह उत्सव और भी गहन और उदात्त हो जाता है, जब यह बसंत पंचमी के पावन रूप में विद्या, कला और वाणी की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है। प्रकृति का यह बाह्य सौंदर्य तब अंतस की शुद्धि का मार्ग बन जाता है।
जहाँ पुष्पों में पराग का संचार होता है, वहीं मानव मन में वीणावादिनी की कृपा से विवेक और सृजन का अवतरण होता है। यह पावन पर्व इस सत्य का उद्घोष है कि प्रकृति का यह नव-परिवर्तन तभी पूर्ण है, जब हमारे विचारों में मौलिकता और शब्दों में माधुर्य का वास हो। इस दिन भक्तगण पीले वस्त्र धारण कर ‘कुंदेंदु तुषार हार धवला’ मां सरस्वती की आराधना करते हैं और अज्ञानता के अंधकार को मिटाने का संकल्प लेते हैं।
आध्यात्मिक पक्ष: कामदेव से सरस्वती तक की यात्रा
बसंत पंचमी का आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत गहरा है। यह ऋतु केवल कामदेव के बाणों और भौतिक आकर्षणों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह सरस्वती के श्वेत प्रकाश में धुलकर पवित्र हो जाती है। यह पर्व सिखाता है कि सृजन की शक्ति जब विवेक से जुड़ती है, तभी वह कल्याणकारी बनती है।
आज जब चहुंओर मलयज समीर का स्पर्श अनुभव हो रहा है, तब यह अनिवार्य है कि हम केवल बाहर के पीले फूलों की छटा ही न देखें, बल्कि अपने भीतर की जड़ता को भी विसर्जित करें। ज्ञान की उस पुनीत ज्योति को प्रज्वलित करने का समय है, जो जीवन को मंगलमय, रसमय और जीवंत बना दे।
निष्कर्ष: नवआरंभ की आत्मा को आत्मसात करें
ऋतुराज बसंत का यह आगमन हमें संदेश देता है कि परिवर्तन ही जीवन का शाश्वत नियम है। जिस प्रकार प्रकृति अपने पुराने पत्तों को त्याग कर नए पल्लवों को धारण करती है, उसी प्रकार हमें भी अपने पुराने द्वेष और नकारात्मकता को त्याग कर प्रेम और ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। आइए, इस नवआरंभ की आत्मा को आत्मसात करें और जीवन के हर क्षण को बसंत की भांति सुरभित और आनंदमय बनाएं।
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