उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले से एक अत्यंत दुर्लभ और विस्मयकारी चिकित्सा मामला सामने आया है। जिला मुख्यालय से लगभग 42 किलोमीटर दूर कोल्हुई के एक निजी अस्पताल में एक महिला ने ऐसे महराजगंज जुड़वां बच्चे को जन्म दिया है, जिनके दो सिर हैं लेकिन उनका शरीर सीने और पेट से आपस में जुड़ा हुआ है। चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘कंजॉइंट ट्विंस’ (Conjoined Twins) कहा जाता है। सुखद बात यह है कि इस जटिल प्रक्रिया के बाद मां और दोनों नवजात लड़कियां पूरी तरह स्वस्थ हैं।

महराजगंज जुड़वां बच्चे: 2 लाख मामलों में एक होने वाली दुर्लभ घटना
लखनऊ के मेडिकल कॉलेज की गायनाकोलॉजिस्ट सुजाता देव के अनुसार, महराजगंज जुड़वां बच्चे का यह मामला बेहद दुर्लभ है। आंकड़ों की मानें तो डेढ़ से दो लाख प्रसव के मामलों में ऐसा केवल एक या दो बार ही देखने को मिलता है। 38 वर्षीय मां मंजू शर्मा, जो बतावलपुर की रहने वाली हैं, उनकी यह चौथी प्रेग्नेंसी थी। 107 किलो वजन वाली मंजू शर्मा का ऑपरेशन अपेक्स हॉस्पिटल के मेडिकल डायरेक्टर अरशद अंसारी की टीम ने सफलतापूर्वक संपन्न किया।
पेट और सीने से जुड़े हैं नवजात, अंगों का है साझा संगम
डॉक्टरों ने बताया कि अल्ट्रासाउंड में ट्विन प्रेग्नेंसी की पुष्टि पहले ही हो गई थी, लेकिन ऑपरेशन के दौरान पता चला कि ये महराजगंज जुड़वां बच्चे ‘कंजॉइंट ट्विंस’ हैं। इन बच्चों के सिर, हाथ और पैर तो अलग-अलग विकसित हुए हैं, लेकिन इनके पेट का हिस्सा आपस में पूरी तरह जुड़ा हुआ है। 3.5 किलो वजन की इन दोनों बच्चियों की स्थिति फिलहाल स्थिर है, लेकिन इनकी लंबी उम्र के लिए इन्हें अलग करना एक बड़ी चुनौती होगी।
पिता की सरकार से गुहार: ऑटो चलाकर पालते हैं परिवार
इन अद्भुत बच्चों के पिता सनोज शर्मा कर्मा चौराहा, बतावलपुर के निवासी हैं और पेशे से एक ऑटो चालक हैं। सनोज ने बताया कि उनके पहले से ही दो बेटियां और एक बेटा है। अब इन दो जुड़वां बेटियों के आने से परिवार बड़ा हो गया है, लेकिन उनके इलाज और सर्जरी का खर्च उठाना सनोज के लिए मुमकिन नहीं है। उन्होंने भावुक होकर महराजगंज जुड़वां बच्चे के बेहतर भविष्य और सुरक्षित ऑपरेशन के लिए सरकार से आर्थिक सहायता और सहयोग की अपील की है।
उत्तर प्रदेश में पहले भी आए हैं ऐसे मामले: एक नजर
महराजगंज जुड़वां बच्चे की यह घटना पहली नहीं है, उत्तर प्रदेश में पहले भी ऐसे दुर्लभ मामले सामने आए हैं जहाँ डॉक्टरों ने चमत्कार कर दिखाया है:
- बरेली (रिद्धि-सिद्धि – 2023): ये बहनें सीने और पेट से जुड़ी थीं। दिल्ली एम्स में 12.5 घंटे चले ऑपरेशन के बाद इन्हें सफलतापूर्वक अलग किया गया।
- बदायूं (2020-2022): कूल्हे और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बच्चियों को एम्स की 24 घंटे लंबी सर्जरी के बाद नया जीवन मिला।
- कुशीनगर (राम-श्याम – 2020): पेट और छाती से जुड़े इन बच्चों को लखनऊ के केजीएमयू (KGMU) में 9 घंटे की सर्जरी के बाद अलग किया गया था।
क्या है आगे की राह?
वर्तमान में सरकारी मेडिकल टीम भी महराजगंज जुड़वां बच्चे की निगरानी कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में 34 हफ्ते से पहले डिलीवरी जोखिम भरी होती है, लेकिन यहाँ ऑपरेशन सफल रहा। अब बच्चों के आंतरिक अंगों की जांच की जा रही है ताकि यह तय किया जा सके कि उन्हें सर्जरी के जरिए कब और कैसे अलग किया जा सकता है।
निष्कर्ष: विज्ञान और उम्मीद का संगम
महराजगंज की यह घटना चिकित्सा जगत के लिए एक शोध का विषय है, तो वहीं एक गरीब परिवार के लिए उम्मीद और संघर्ष की कहानी। महराजगंज जुड़वां बच्चे का स्वस्थ होना एक सकारात्मक संकेत है। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की तत्परता यह सुनिश्चित कर सकती है कि इन मासूमों को भी रिद्धि-सिद्धि या राम-श्याम की तरह एक सामान्य और स्वस्थ जीवन मिल सके।
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