गाजियाबाद/नई दिल्ली: 15 March 2026

जीवन और मृत्यु के बीच की धुंधली रेखा पर 13 साल तक खड़े रहने वाले गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी आज पूरे देश की आंखों में आंसू और दिल में सम्मान पैदा कर रही है। एक दुखद हादसे के बाद कोमा में गए हरीश कभी होश में नहीं लौट पाए। लेकिन उनके जीवन के अंतिम अध्याय ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो आने वाले समय में अंगदान (Organ Donation) और गरिमामय मृत्यु (Dignified Death) के प्रति समाज का नजरिया बदल देगी। हरीश राणा अंगदान केस 2026 न केवल एक बेटे की लंबी पीड़ा का अंत है, बल्कि कई अनजान चेहरों के लिए नई मुस्कान की शुरुआत भी है।
13 साल का मौन इंतजार और हारती उम्मीदें
हरीश राणा के लिए पिछले 13 साल किसी कालकोठरी से कम नहीं थे, जहाँ शरीर तो था पर चेतना नहीं। उनके माता-पिता ने एक दशक से अधिक समय तक हर मंदिर की चौखट और हर अस्पताल का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने इलाज में अपनी पूरी जमापूंजी और जीवन की ऊर्जा लगा दी। लेकिन जब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी हाथ खड़े कर दिए और डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि हरीश का मस्तिष्क अब कभी प्रतिक्रिया नहीं देगा, तब शुरू हुआ एक माता-पिता के जीवन का सबसे कठिन संघर्ष।
सुप्रीम कोर्ट से पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति
भारत में पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को लेकर कानून बहुत सख्त है। हरीश के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और अपने बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की गहराई और हरीश की ‘वेजिटेटिव स्टेट’ (Vegetative State) को देखते हुए मानवीय आधार पर इसकी अनुमति प्रदान की। यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।
अंगदान का संकल्प: मृत्यु में भी जीवन की तलाश
हरीश राणा अंगदान केस 2026 इसलिए खास नहीं है कि उन्हें इच्छामृत्यु मिली, बल्कि इसलिए खास है क्योंकि उनके माता-पिता ने एक अत्यंत मानवीय इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि “अगर हमारे बेटे की सांसे थम रही हैं, तो उसके शरीर का कोई हिस्सा किसी और के काम आना चाहिए।”
- अंगदान की अहमियत: भारत में हर साल हजारों लोग अंगों की कमी के कारण जान गंवा देते हैं।
- साहस की मिसाल: एक ऐसे समय में जब माता-पिता अपने बच्चे को खोने के गम में डूबे हों, किसी और की जान बचाने के बारे में सोचना ‘देवत्व’ के समान है।
समाज के लिए एक कठिन प्रश्न: क्या हम ऐसा कर पाते?
हरीश राणा का मामला हमसे एक बुनियादी सवाल पूछता है क्या हम इतने साहसी हैं कि अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के चले जाने के बाद उनके अंगों को किसी अजनबी को सौंप सकें?
- इंसानियत: अंगदान से एक व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद भी 8 लोगों की जान बचा सकता है।
- साहस: दुख की घड़ी में दूसरों के लिए सोचना ही सबसे बड़ा साहस है।
- मिसाल: राणा परिवार ने साबित किया कि एक जीवन का अंत केवल राख होना नहीं, बल्कि किसी और के लिए नई शुरुआत होना चाहिए।
निष्कर्ष: हरीश अब भी जीवित रहेंगे

हरीश राणा अंगदान केस 2026 यह सिखाता है कि जीवन केवल सांस लेने का नाम नहीं है, बल्कि दूसरों के काम आने का नाम है। हरीश अब शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन किसी की आंखों की रोशनी बनकर, किसी के धड़कते दिल बनकर या किसी की मुस्कुराती सांस बनकर वे इसी दुनिया में जीवित रहेंगे। उनके माता-पिता का यह बलिदान समाज को अंगदान के प्रति प्रेरित करने वाला सबसे बड़ा संदेश है।












