गोलाबाजार, गोरखपुर: उत्तर प्रदेश सरकार एक ओर पशुधन की सुरक्षा और संवर्धन के लिए ‘पशु सेवा’ को प्राथमिकता दे रही है, वहीं दूसरी ओर गोरखपुर जनपद की गोला तहसील मुख्यालय का मुख्य पशु चिकित्सालय सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। वर्तमान में यह अस्पताल पूरी तरह से ‘चिकित्सक विहीन’ हो चुका है और ‘उधार’ के कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है। आलम यह है कि बीमार पशुओं का इलाज राम भरोसे है, जिससे स्थानीय पशुपालकों में गहरा असंतोष व्याप्त है।

छह माह से रिक्त है डॉक्टर का पद: व्यवस्था बनी मजाक
तहसील मुख्यालय जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित इस पशु चिकित्सालय की दुर्दशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ तैनात डॉक्टर के स्थानांतरण के बाद पिछले 6 महीनों से किसी स्थायी डॉक्टर की नियुक्ति नहीं की गई है। इतना ही नहीं, अस्पताल में फार्मासिस्ट का पद भी लंबे समय से रिक्त पड़ा है।
एक तहसील मुख्यालय जहाँ हजारों की संख्या में पशुपालक अपने मवेशियों के स्वास्थ्य के लिए निर्भर हैं, वहां संसाधनों का यह अभाव शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। Animal Husbandry यानी पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन चिकित्सा के अभाव में यह रीढ़ कमजोर पड़ती दिख रही है।
एक डॉक्टर, दो अस्पताल: ‘इधर कुआँ, उधर खाई’ जैसे हालात
गोला पशु अस्पताल की चरमराई व्यवस्था को संभालने के लिए विभाग ने एक ‘अस्थाई’ और ‘जुगाड़ू’ व्यवस्था की है। यहाँ की जिम्मेदारी पशु चिकित्सालय डाड़ी खास के डॉ. जियाउल्लाह सिद्दीकी और फार्मासिस्ट शैलेन्द्र को सौंपी गई है।
अब विडंबना देखिए, ये दोनों कर्मचारी एक ही समय में दो अलग-अलग अस्पतालों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब ये दोनों गोला अस्पताल में बैठते हैं, तो डाड़ी खास का अस्पताल सूना पड़ जाता है। यदि उस दिन डाड़ी खास क्षेत्र का कोई पशुपालक अपने गंभीर रूप से बीमार मवेशी को लेकर अस्पताल पहुँचता है, तो उसे ताला लटका मिलता है। यही स्थिति गोला अस्पताल की भी होती है जब डॉक्टर डाड़ी खास में ड्यूटी पर होते हैं। इस “उधार की डॉक्टर” वाली नीति ने दोनों ही क्षेत्रों के पशुपालकों को अधर में लटका दिया है।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के भरोसे मुख्यालय का अस्पताल
गोला पशु चिकित्सालय में वर्तमान में स्थायी रूप से केवल एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, मोहम्मद हसन ही तैनात हैं। डॉक्टर और फार्मासिस्ट की अनुपस्थिति में अस्पताल केवल एक ‘इमारत’ बनकर रह गया है।
वर्तमान समय में एस.आई.आर. (SIR) यानी सर्वे और टीकाकरण से जुड़ा महत्वपूर्ण कार्य चल रहा है। इस कार्य में भी डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई गई है। स्थिति यह हो जाती है कि जिस दिन टीकाकरण अभियान चलता है, उस दिन दोनों ही केंद्रों (गोला और डाड़ी खास) पर कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं रहता। ऐसे में आकस्मिक स्थिति में यदि किसी पशु को तत्काल उपचार की आवश्यकता हो, तो वह दम तोड़ देता है।
पशुपालकों की मांग और आर्थिक नुकसान
ग्रामीण क्षेत्रों में गाय, भैंस और अन्य मवेशी किसानों की आजीविका का मुख्य स्रोत होते हैं। एक दुधारू पशु की बीमारी किसान के पूरे परिवार के बजट को बिगाड़ देती है। गोला क्षेत्र के पशुपालकों का कहना है कि जब वे सरकारी अस्पताल पहुँचते हैं और वहां डॉक्टर नहीं मिलते, तो उन्हें मजबूरी में निजी झोलाछाप डॉक्टरों की शरण लेनी पड़ती है। निजी इलाज न केवल महंगा होता है, बल्कि उसमें पशु की जान जाने का खतरा भी बना रहता है।
पशुपालकों ने सामूहिक रूप से मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी (CDVO) से मांग की है कि गोला जैसे महत्वपूर्ण मुख्यालय पर तुरंत एक स्थायी डॉक्टर और फार्मासिस्ट की नियुक्ति की जाए।
प्रशासनिक पक्ष: जल्द नियुक्ति का भरोसा
इस पूरे प्रकरण पर जब Chief Veterinary Officer (मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी) धर्मेंद्र पांडेय से बातचीत की गई, तो उन्होंने बताया कि डॉक्टरों की नियुक्ति सीधे शासन स्तर से की जाती है। हालांकि, उन्होंने एक राहत भरी खबर भी साझा की है।
सीवीओ धर्मेंद्र पांडेय का कहना है कि:
“शासन स्तर से गोला और बांसगांव पशु चिकित्सालयों के लिए नए डॉक्टरों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। नवनियुक्त डॉक्टर बहुत जल्द ही अपने निर्धारित स्थानों पर जाकर ज्वाइनिंग कर लेंगे, जिससे यह समस्या स्थायी रूप से समाप्त हो जाएगी।”
निष्कर्ष: कागजी नियुक्ति या धरातल पर समाधान?
प्रशासन के आश्वासन के बाद अब क्षेत्र के पशुपालकों को केवल इस बात का इंतजार है कि वे ‘जल्द’ कब आएगा। क्या बजट और नियुक्ति की फाइलें सरकारी दफ्तरों से निकलकर अस्पताल के दरवाजों तक पहुँच पाएंगी? गोला पशु अस्पताल का ‘चिकित्सक विहीन’ होना डिजिटल इंडिया और विकसित भारत की उन कड़ियों में से एक है जिसे जल्द सुधारने की आवश्यकता है।
जब तक स्थायी नियुक्ति नहीं होती, तब तक डाड़ी खास और गोला के बीच झूलती यह स्वास्थ्य व्यवस्था पशुओं के जीवन के साथ एक बड़ा जोखिम बनी रहेगी। प्रशासन को चाहिए कि जॉइनिंग की प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर पूरा कराए ताकि मवेशियों को समय पर उपचार मिल सके।
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