गोलाबाजार, गोरखपुर: 10 फरवरी 2026
विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच गोरखपुर के गोला तहसील से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उरुवा विकास खंड के ग्राम पंचायत रसूलपुर माफी के राजस्व टोला पढ़ौतिया के ग्रामीणों का धैर्य अब जवाब दे गया है। मंगलवार को तहसील मुख्यालय पर जुटे दर्जनों ग्रामीणों ने हुंकार भरते हुए चुनावी बहिष्कार का ऐलान कर दिया। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि “रोड नहीं तो वोट नहीं” जब तक उनके गांव की किस्मत बदलने वाली पक्की सड़क (पिच रोड) नहीं बनेगी, तब तक वे किसी भी चुनाव में मतदान नहीं करेंगे।
दो पंचायतों के बीच फंसा विकास का ‘रास्ता’
पढ़ौतिया गांव की समस्या जितनी भौतिक है, उतनी ही प्रशासनिक जटिलताओं में उलझी हुई है। ग्रामीणों ने उपजिलाधिकारी (SDM) की अनुपस्थिति में उनके स्टेनो को ज्ञापन सौंपते हुए अपनी व्यथा सुनाई। गांव का मुख्य संपर्क मार्ग, जो धुरियापार-शाहपुर-बेलघाट मुख्य सड़क से जुड़ता है, तकनीकी रूप से ग्राम सभा पिपरी बुजुर्ग की सीमा में पड़ता है। यही तकनीकी पेंच गांव की बर्बादी का कारण बन गया है।
ग्रामीणों के अनुसार, जब वे अपने ग्राम प्रधान (रसूलपुर माफी) से गुहार लगाते हैं, तो वे अधिकार क्षेत्र न होने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। वहीं, जब पिपरी बुजुर्ग के ग्राम प्रधान से संपर्क किया जाता है, तो उनका तर्क होता है कि “इस रास्ते से मेरे गांव के लोग नहीं गुजरते, तो मैं क्यों बनवाऊं?” दो प्रधानों की इस खींचतान और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने पढ़ौतिया के ग्रामीणों को अधर में लटका दिया है।

गड्ढों में तब्दील हुई जिंदगी: छात्रों और मरीजों की शामत
ज्ञापन में ग्रामीणों ने सड़क की बदहाली का जो खाका खींचा है, वह डराने वाला है। बारिश के मौसम में तो यह रास्ता तालाब बन जाता है, लेकिन वर्तमान शुष्क मौसम में भी सड़क पर पड़ी गहरी दरारें और बड़े-बड़े गड्ढे हादसों को न्योता दे रहे हैं।
- शिक्षा पर प्रहार: सड़क खराब होने के कारण छात्र-छात्राएं समय पर स्कूल नहीं पहुँच पाते। कई बार साइकिल सवार बच्चे गड्ढों में गिरकर चोटिल हो चुके हैं।
- स्वास्थ्य सेवा से दूरी: सबसे बुरा हाल गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों का है। एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुँच पाती, जिससे मरीजों को चारपाई या पालकी के सहारे उरुवा सीएचसी तक ले जाना पड़ता है।
- तीन किमी का अतिरिक्त चक्कर: बारिश में मुख्य मार्ग पूरी तरह कट जाने के कारण ग्रामीणों को महज कुछ मीटर की दूरी तय करने के लिए 3 किलोमीटर घूमकर आना-जाना पड़ता है।

‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का पोस्टर और ग्रामीणों का संकल्प
ग्रामीणों का आक्रोश अब केवल ज्ञापन तक सीमित नहीं है। पढ़ौतिया टोले के प्रवेश द्वार और मुख्य सड़क मार्ग पर “वोट नहीं” के बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर लगा दिए गए हैं। ग्रामीणों ने सामूहिक बैठक कर यह निर्णय लिया है कि चाहे पंचायत चुनाव हो या आगामी विधानसभा चुनाव, पूरा गांव मतदान केंद्र तक नहीं जाएगा। यह चुनावी बहिष्कार शासन को यह बताने की कोशिश है कि लोकतंत्र में जनता की बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी महंगी पड़ सकती है।
ज्ञापन देने वालों में भारी मौजूदगी
तहसील परिसर में विरोध प्रदर्शन करने वालों में मुख्य रूप से दीनानाथ मौर्य, बृजेश, विकास, भूपेंद्र, राम सागर मौर्य, प्रभुनाथ मौर्य, सोनू मौर्य, राम बचन मौर्य, संदीप, सुभाष और पंकज सहित करीब तीन दर्जन ग्रामीण शामिल रहे। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़क का निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो वे तहसील मुख्यालय पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने को मजबूर होंगे।
निष्कर्ष: कब टूटेगी प्रशासन की चुप्पी?
पढ़ौतिया गांव की यह लड़ाई केवल एक सड़क की नहीं, बल्कि उनके सम्मान और नागरिक अधिकारों की है। दो ग्राम पंचायतों के बीच फुटबॉल बने इस गांव की सुध लेने वाला कोई नहीं है। चुनावी बहिष्कार जैसा कड़ा कदम यह दर्शाता है कि ग्रामीण अब आश्वासनों से थक चुके हैं। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस गंभीर चेतावनी के बाद जागता है या पढ़ौतिया के ग्रामीण आगामी चुनावों में पोलिंग बूथों को सूना रखकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे।
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