गोलाबाजार, गोरखपुर: 23 फरवरी 2026
देश के शिक्षा जगत में पुरानी नियुक्तियों और नई योग्यता शर्तों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर सोमवार को गोरखपुर जनपद के विकास खंड गोला के परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों ने सरकार के हालिया निर्णयों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शिक्षकों ने विद्यालयों में काली पट्टी बांधकर शिक्षण कार्य किया और यह संदेश दिया कि वे अपनी सेवा शर्तों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह शिक्षक विरोध उन शिक्षकों पर टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता थोपने के विरुद्ध है, जो इस नियम के लागू होने से पहले ही सेवा में आ चुके थे।
विरोध की मुख्य वजह: टीईटी (TET) की अनिवार्यता
विवाद का मुख्य केंद्र वह प्रस्तावित नियम है, जिसके तहत 1 अप्रैल 2010 (भारत में आरटीई लागू होने की तिथि) और 27 जुलाई 2011 (उत्तर प्रदेश में आरटीई लागू होने की तिथि) से पहले नियुक्त हुए शिक्षकों को भी अब टीईटी परीक्षा पास करना अनिवार्य बताया जा रहा है।
प्राथमिक शिक्षक संघ गोला के अध्यक्ष काशी नाथ तिवारी ने विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए कड़े शब्दों में कहा, “शिक्षा अधिकार अधिनियम (RTE) लागू होने से पूर्व जारी विज्ञप्तियों और शासनादेशों के तहत नियुक्त शिक्षकों पर अब नई सेवा शर्तें थोपना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है। जो शिक्षक अपनी योग्यता साबित कर सरकारी सेवा में 20-25 साल बिता चुके हैं, उन्हें आज परीक्षा के कटघरे में खड़ा करना उनके अनुभव और निष्ठा का अपमान है।”

‘रिटायरमेंट की उम्र में कैसी परीक्षा?’
संगठन के मंत्री प्रेम प्रकाश सिंह ने शिक्षकों की मानसिक पीड़ा को व्यक्त करते हुए सवाल उठाया कि जो शिक्षक सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़े हैं, उनसे आज फिर से प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करने की अपेक्षा करना कहाँ का न्याय है? उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा निर्धारित उस समय की अनिवार्य योग्यता के आधार पर ही इन शिक्षकों का चयन हुआ था, फिर आज नियमों को पिछली तारीख (Backdate) से लागू करना तर्कसंगत नहीं है।
जिला कार्य समिति सदस्य मनोज सिंह ने आयु सीमा का मुद्दा उठाते हुए कहा कि “50 से 55 वर्ष की आयु पार कर चुके शिक्षकों से नई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की उम्मीद करना उनके मानसिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। इस उम्र में शिक्षक अपने अनुभव से छात्र-छात्राओं का भविष्य गढ़ते हैं, न कि स्वयं प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते हैं।”
न्यायपालिका और सरकार से पुनर्विचार की मांग
वरिष्ठ उपाध्यक्ष उपेंद्र मिश्र और कोषाध्यक्ष सुरेश कुमार ने संयुक्त रूप से कहा कि इस मनमानी का पूरे देश में विरोध किया जाएगा। उन्होंने सरकार और न्यायालय से अपील की है कि वे इस संवेदनशील मुद्दे पर पुनर्विचार करें। शिक्षकों का तर्क है कि कानून कभी भी पिछली तारीख से सेवा शर्तों को बदलने के लिए नहीं होता, खासकर तब जब वह कर्मचारी के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता हो।
एकजुट हुए विभिन्न शिक्षक संगठन
इस शिक्षक विरोध की सबसे खास बात यह रही कि इसमें केवल एक संगठन नहीं, बल्कि सभी मान्यता प्राप्त शिक्षक संघों ने एक सुर में अपनी आवाज बुलंद की। शिक्षक मिथिलेश राय और विनोद सिंह ने इसे एक ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि जब तक सरकार अपना फैसला वापस नहीं लेती, तब तक चरणबद्ध तरीके से आंदोलन जारी रहेगा।
शिक्षकों ने काली पट्टी बांधकर कक्षाओं में पढ़ाया, जिससे यह स्पष्ट संदेश गया कि वे छात्रों की पढ़ाई का नुकसान नहीं चाहते, लेकिन अपने आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए लड़ने को विवश हैं। गोला विकास खंड के दर्जनों विद्यालयों में सुबह से ही शिक्षकों के हाथों पर काली पट्टियां नजर आईं।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया और भविष्य की रणनीति
फिलहाल शिक्षा विभाग के स्थानीय अधिकारियों ने इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन शिक्षकों का यह मौन प्रदर्शन शासन तक पहुँच चुका है। टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया का कहना है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो वे जिला मुख्यालय पर धरना प्रदर्शन करने और दिल्ली के जंतर-मंतर तक कूच करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
निष्कर्ष
गोला में हुआ यह शिक्षक विरोध शिक्षा विभाग के भीतर व्याप्त असंतोष की एक छोटी सी झलक है। अनुभव और नई अनिवार्यताओं के बीच का यह संघर्ष कानूनी पेचीदगियों में उलझता दिख रहा है। 2011 से पहले नियुक्त हजारों शिक्षक आज अनिश्चितता के दौर में हैं। सरकार को चाहिए कि वह वरिष्ठ शिक्षकों के अनुभव का सम्मान करे और नियमों के क्रियान्वयन में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए, ताकि गुरुजनों का मनोबल न गिरे और शिक्षा व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे।













