बृजनाथ तिवारी | गोलाबाज़ार, गोरखपुर | 12 जनवरी

बृजनाथ तिवारी, गोलाबाजार
१९४२ में ब्रिटिश सरकार के शासन में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, पंडित राम लखन शुक्ल ने बहुत बड़ा काम किया। उन्होंने गोला थाना पर तिरंगा फहराया था, जो लोगों की यादों में आज भी जीवित है। लेकिन स्वतंत्र भारत में शासन और प्रशासन ने उन्हें शुरू से ही भुला दिया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब उन्होंने सीने पर पिस्तौल सटी होने के बावजूद अंग्रेजी सरकार में गोला थाना पर तिरंगा फहराया था, वहां उस ऐतिहासिक घटना का एक शिलापट्ट तक नहीं है। पंडित राम लखन शुक्ल की वीरता और बलिदान को याद रखना चाहिए।
गोला-कौड़ीराम मार्ग पर, गोला से चार किलोमीटर उत्तर की ओर स्थित ग्राम ककरही में एक जमींदार परिवार में पंडित राम लखन शुक्ल का जन्म हुआ। जब पंडित राम लखन शुक्ल इंटरमीडिएट के दूसरे वर्ष के छात्र थे, तभी उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कदम रख दिया। उस समय, राष्ट्रीय चेतना का मुख्य केंद्र गोला थाना क्षेत्र का खोपापार गांव हुआ करता था।
पंडित राम लखन शुक्ल खोपापार राष्ट्रीय विद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो गए। जल्द ही, उन्हें 1939 में इसी विद्यालय का प्रधानाचार्य बना दिया गया। इसके बाद, 1940 में वे अपने मित्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय केशभान राय द्वारा ककरही में स्थापित आनंद विद्या पीठ इंटर कॉलेज में पढ़ाने लगे।
- 6 अप्रैल 1941 को राम लखन शुक्ल, रामबचन त्रिपाठी और सीताराम नायक ने कांग्रेस की डिस्ट्रिक्ट कमेटी से आज्ञा लेकर विद्यालय के पीछे बागीचे में सत्याग्रह शुरू कर दिया। इस सत्याग्रह के परिणामस्वरूप उन तीनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। वे तीनों वास्तविक वीर सत्याग्रही थे जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। इन सपूतों को एक-एक वर्ष का सश्रम कारावास और 100 रुपए का जुर्माना सुनाया गया।
- शौर्य की पराकाष्ठा एक ऐसी स्थिति है जहां व्यक्ति अपने साहस और बलिदान का प्रदर्शन करता है। यह एक ऐसी अवस्था है जहां कोई व्यक्ति अपने जीवन को खतरे में डालकर देश और समाज की रक्षा के लिए आगे आता है। सीने पर पिस्तौल की नाल और थाने पर तिरंगा यह दृश्य हमें उन वीरों की याद दिलाता है जिन्होंने देश की स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है। यह एक ऐसी कहानी है जो हमें साहस, बलिदान, और देशभक्ति की भावना से भर देती है।
गोला के थानेदार नुरुल होदा ने श्री शुक्ल और उनके साथियों रामबचन त्रिपाठी व सीताराम नायक पर पिस्तौल तान दी। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और थाने पर तिरंगा फहराने का साहस दिखाया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
अंग्रेजों ने उनके पैतृक घरों को जला दिया और माता-पिता को यातनाएं दीं। बाद में, 1944-45 में तीनों को रिहा कर दिया गया।
आजाद भारत में राजनीतिक सफर और त्याग की मिसाल देने वाले नेताओं की कहानियाँ हमेशा से प्रेरणा का स्रोत रही हैं। इन नेताओं ने न केवल देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि स्वतंत्रता के बाद देश को सही दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महात्मा गांधी एक ऐसा नाम है जिसने अपने अद्वितीय विचारों से पूरे विश्व को प्रभावित किया है। उनके जीवन में अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी का राजनीतिक जीवन काफी लंबा और चुनौतियों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनकी त्याग की भावना और देश के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें एक महान नेता बनाया। महात्मा गांधी की यही खूबियाँ उन्हें इतना सम्मान दिलाती हैं।
जवाहरलाल नेहरू एक अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, जो भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। नेहरू जी ने देश के विकास और आधुनिकीकरण में बहुत बड़ा योगदान दिया। उनकी दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता ने भारत को विश्व मंच पर एक मजबूत स्थान दिलाने में बहुत मदद की।
सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने भी देश की एकता और अखंडता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने रियासतों को एकजुट करने में बहुत बड़ा योगदान दिया, जिससे भारत एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र बन सका।
आजाद भारत में राजनीतिक यात्रा और त्याग की ये मिसालें हमें यह शिक्षा देती हैं कि देश के प्रति वफादारी और त्याग की भावना से ही हम अपने देश को आगे बढ़ा सकते हैं। इन नेताओं की कहानियाँ हमें प्रेरित करती हैं कि हम अपने कर्तव्यों को ईमानदारी और समर्पण के साथ निभाएँ।
आजाद भारत में पण्डित रामलखन शुक्ल का राजनैतिक सफर शुरू हुआ। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1960 में गोला के प्रमुख के रूप में की। इसके बाद, वे 1962 से 1967 तक भौवापार विधान सभा के विधायक रहे। जब विधान सभा का नाम बदला, तो पण्डित रामलखन शुक्ल 1969 से 1974 तक कौड़ीराम विधान सभा से विधायक चुने गए।
इस बीच, तत्कालीन प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी ने उन्हें नैनीताल में 18 एकड़ भूमि दी। पण्डित रामलखन शुक्ल ने इस भूमि को सरकार को दान कर दिया, जो उनकी देशभक्ति और निस्वार्थता को दर्शाता है। पण्डित रामलखन शुक्ल का देहावसान 19 नवम्बर 1974 को हो गया, लेकिन उनकी राजनैतिक विरासत और देशभक्ति की भावना आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
शासन की उपेक्षा से मर्माहत हैं परिजन और क्षेत्रवासी
दर्द होता है उपेक्षा से, थाने पर नहीं है ऐतिहासिक क्षण की कोई स्मृति। देश को आजाद कराने के लिए कई बार जेल यात्रा करने वाले इस वीर सपूत की याद लोगों के दिलों में तो है, लेकिन गोला थाना पर उनके द्वारा फहराए गए तिरंगे के ऐतिहासिक क्षण का गवाह कुछ नहीं है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की यह अनदेखी उनके परिवारीजनों को तो पीड़ा पहुंचाती ही, क्षेत्र के लोग भी हुक्मरानों और राजनीतिकों की इस उपेक्षा से मर्माहत हैं।
पंडित रामलखन शुक्ल के तीन बेटे थे। इनमें से एक चंद्रशेखर शुक्ल धुरियापार के विधायक चुने गए थे। अब वे नहीं हैं। स्वर्गीय चंद्रशेखर शुक्ल के बड़े बेटे सरोज रंजन शुक्ल आनंद विद्यापीठ इंटर कॉलेज, ककरही में प्रवक्ता हैं। कॉलेज के गेट के दाहिनी तरफ, प्रदेश के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय मार्कंडेय चंद ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामलखन शुक्ल और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केशवान राय की आदमकद प्रतिमा स्थापित कराई है।
पंडित रामलखन शुक्ल के पौत्र सरोज रंजन शुक्ल ने बताया कि उन्होंने नौसढ़ चौराहे पर पंडित रामलखन शुक्ल की प्रतिमा स्थापित करने के लिए साल 2010 में शासन को एक पत्र भेजा था। यह पत्र 6 अगस्त 2010 को भेजा गया था, लेकिन दुर्भाग्य से इसे अनदेखा कर दिया गया। यह मामला वर्षों बाद भी अधूरा है, जो कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित रामलखन शुक्ल के प्रति एक बड़ा अपमान है।
शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले बतन पर मरने वालों का यही वाकी निशा होगा














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