बृजनाथ तिवारी की रिपोर्ट
गोलाबाजार (गोरखपुर): 21 मार्च 2026

भारतीय संस्कृति और सभ्यता में देवस्थानों का महत्व केवल धार्मिक पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि ये हमारे गौरवशाली इतिहास और सामाजिक एकता के संवाहक भी हैं। गोरखपुर जनपद के दक्षिणांचल स्थित गोला तहसील की ग्राम सभा भीटी में विराजमान सम्मय माता का मंदिर इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यहाँ की मिट्टी में श्रद्धा की महक है और यहाँ की हवाओं में माता के प्रति अटूट विश्वास। नवरात्र के दिनों में तो यहाँ का दृश्य विहंगम हो जाता है, जहाँ घंटों की गूँज और शंख की ध्वनि पूरे क्षेत्र को दिव्य ऊर्जा से भर देती है।
भौगोलिक स्थिति: सुलभ मार्ग और शांत वातावरण

प्रसिद्ध सम्मय माता का मंदिर गोला-बड़हलगंज मुख्य मार्ग पर स्थित मदारिया चौराहे से लगभग 3 किलोमीटर उत्तर दिशा में भीटी गाँव के सघन क्षेत्र में स्थित है। मदारिया से मंदिर तक पहुँचने के लिए सुव्यवस्थित पिच मार्ग बना हुआ है। इसके अतिरिक्त हाटा, गोला और बड़हलगंज के भीतरी रास्तों से भी श्रद्धालु सुगमता से यहाँ पहुँच सकते हैं। यह स्थान शांति के उपासकों के लिए सदैव आकर्षण का केंद्र रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: औरंगजेब की जेल से मुक्ति की गाथा
मन्दिर की उत्पत्ति के संबंध में अनेक रोचक लोककथाएं प्रचलित हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. आर.बी. पांडेय की पुस्तक ‘गोरखपुर जनपद’ के अनुसार, लगभग 400 वर्ष पूर्व हरियाणा प्रांत की भीटहा तहसील एक छोटी सी रियासत थी। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस रियासत पर आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया और इसके मालिक (जमींदार) को बंदी बनाकर दिल्ली के कारागार में डाल दिया।
भीटहा रियासत के मालिक सम्मय माता के अनन्य भक्त थे। जनश्रुति है कि भक्त की पीड़ा से द्रवित होकर माता ने अपने दैवीय प्रभाव से जमींदार और उनके सहयोगियों को जेल से मुक्त कराया और अपने रथ में बैठाकर भीटी के सघन वन में लाकर छोड़ दिया। तभी से माता यहाँ ‘सम्मय माता’ के रूप में प्रतिष्ठित हो गईं। वन में प्रस्तर की मूर्ति मिलने के बाद क्षेत्रीय जनता की आस्था पल्लवित हुई और एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।
सांप्रदायिक सौहार्द: एकता का अनूठा संदेश
सम्मय माता का यह दरबार धर्म और मजहब की सीमाओं को लांघकर समाज को एकता का संदेश देता है। मंदिर लगभग 8 एकड़ के विशाल क्षेत्रफल में फैला है, जहाँ स्थित दर्जनों दुकानों में से अधिकांश मुस्लिम समुदाय की हैं। जहाँ हिंदू यहाँ श्रद्धा और मन्नतें लेकर आते हैं, वहीं मुस्लिम परिवार श्रद्धालुओं की सेवा और मंदिर के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी निभाते हैं। यह मंदिर साझी विरासत की एक खड़ी मिसाल है।
विकास और पर्यटन मानचित्र पर स्थान
वर्ष 2004 में तत्कालीन काबीना मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी ने इस मंदिर के कायाकल्प का संकल्प लिया था। उनकी विधायक निधि से हुए कार्यों के बाद आज यह मंदिर उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के मानचित्र पर अंकित है।
- सुविधाएं: मंदिर परिसर में बाउंड्री वॉल, दस भव्य विश्रामालय, शौचालय, दर्जनों हैंडपंप और बीच में एक विशाल पोखरा स्थित है।
- धर्मशाला: श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए मेहदराव निवासी समाजसेवी राजनाथ दुबे ने एक भव्य धर्मशाला का निर्माण कराया है।
भक्तों की मुरादें और मन्नतें
मान्यता है कि माँ सम्मय के दरबार में सच्चे दिल से मांगी गई मन्नत कभी निष्फल नहीं जाती। भक्त अपनी मुराद पूरी होने पर माता को घंटा, चुनरी और कड़ाही (प्रसाद) चढ़ाते हैं। क्षेत्र के हजारों गांवों के नौनिहालों का मुंडन संस्कार भी इसी पवित्र परिसर में संपन्न होता है। यहाँ केवल गोरखपुर ही नहीं, बल्कि मऊ, आजमगढ़, देवरिया, संतकबीर नगर, कुशीनगर और यहाँ तक कि प्रवासी भारतीयों की भी भारी भीड़ वर्ष भर दिखाई देती है।
पुजारी परिवार: पीढ़ियों से जारी सेवा
मंदिर की सेवा और देखभाल का दायित्व पड़ौली गाँव के मिश्रा परिवार के पास है। निरंतर साफ-सफाई और माता की विधिवत पूजा-अर्चना में लगा यह परिवार पीढ़ियों से माता की सेवा कर रहा है। माना जाता है कि इसी खानदान को माता सम्मय का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है।
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