गोलाबाजार/उरुवाबाजार, गोरखपुर: 9 March 2026
जनपद के माल्हनपार क्षेत्र में भक्ति की अविरल धारा बह रही है। ऋषि सेवा समिति, माल्हनपार के तत्वावधान में स्थानीय सरकारी अस्पताल के प्रांगण में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा माल्हनपार के द्वितीय दिवस पर श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा देखने को मिला। काशी से पधारे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वक्ता, श्रीविद्या सिद्ध एवं ज्योतिष सम्राट पूज्य राघव ऋषि जी ने अपने मुखारविंद से कथा का रसपान कराते हुए जीवन के गूढ़ रहस्यों को उजागर किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य का बिखरना और संवरना पूरी तरह उसके अपने निर्णयों और ईश्वर के प्रति उसकी निष्ठा पर निर्भर करता है।

संत मिलन और प्रभु कृपा का अंतर्संबंध
कथा के प्रारंभ में राघव ऋषि जी ने जीवन के सार को समझाते हुए कहा कि जो माया (सांसारिक मोह-माया) के पीछे भागता है, वह अंततः बिखर जाता है, लेकिन जो परमात्मा की शरण में जाता है, वह निखर जाता है। उन्होंने राजा परीक्षित के प्रसंग का उदाहरण देते हुए बताया कि जब जीव परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल होता है, तभी प्रभु की कृपा से संतों का मिलन होता है।
उन्होंने कहा:
“परीक्षित को श्राप मिला था, और उस भय से मुक्त करने के लिए स्वयं शुकदेव जी का आगमन हुआ। संसार में रहते हुए भी मनुष्य को अपने भीतर ‘संतवृत्ति’ जागृत करनी चाहिए। यदि आप भगवान की ओर एक कदम बढ़ाएंगे, तो भगवान आपकी ओर दस कदम बढ़ाएंगे।“
ध्रुव चरित्र: मन की रुचि और नीति का संघर्ष
श्रीमद्भागवत कथा माल्हनपार के मंच से ध्रुव चरित्र की व्याख्या करते हुए ऋषि जी ने एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने बताया कि राजा उत्तानपाद स्वयं यह जीव है, जिसकी दो पत्नियां ‘सुरुचि’ और ‘सुनीति’ हमारे मन के दो पहलुओं को दर्शाती हैं।
- सुरुचि: वह जो मन को अच्छी लगे (इच्छा और भोग)।
- सुनीति: वह जो नीतिगत और सही हो (धर्म और नियम)।
ऋषि जी ने कहा कि मनुष्य अक्सर सुरुचि के पीछे भागता है, लेकिन ध्रुव (अविनाशी पद) की प्राप्ति केवल सुनीति से ही संभव है। जब तक जीवन में नारद रूपी गुरु या संत का प्रवेश नहीं होता, तब तक प्रभु की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। बालक ध्रुव की भक्ति यह सिखाती है कि यदि आप परमात्मा के पीछे लगेंगे, तो संपूर्ण संसार आपके पीछे स्वतः ही लग जाएगा।

जड़भरत प्रसंग: अनावश्यक आसक्ति का परिणाम
कथाक्रम को आगे बढ़ाते हुए पूज्य राघव ऋषि जी ने भारतवर्ष के नामकरण का आधार रहे ‘भरत जी’ के जीवन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भरत जी अपने हर कर्म का फल परमात्मा को अर्पण करते थे, जिसे ‘कर्मयोग’ कहा जाता है। हालांकि, वन में प्रवास के दौरान एक मृग (हिरण) के बच्चे के प्रति उनकी ‘अनावश्यक आसक्ति’ उनके पतन का कारण बनी।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा:
“जब हरि चिंतन घटता है और हिरण चिंतन (संसार का चिंतन) बढ़ता है, तो जीव लक्ष्य से भटक जाता है। भरत जी का अंत समय मृग के चिंतन में बीता, फलस्वरूप उन्हें अगला जन्म मृग के रूप में लेना पड़ा। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन इस प्रकार जीना चाहिए कि हम हर क्षण मृत्यु के लिए तैयार रहें, कहीं ऐसा न हो कि मृत्यु आए और हमारी तैयारी ही न हो।“
सत्संग की महिमा और आत्म-साक्षात्कार
सत्संग के महत्व पर बोलते हुए ऋषि जी ने कहा कि मनुष्य ने अपने पूरे जीवन में जितना समय सत्संग और हरि चर्चा में बिताया है, वास्तव में उसने उतना ही सार्थक जीवन जिया है। बाकी समय तो केवल सांसारिक औपचारिकताओं में बीत जाता है। विदुर और उद्धव के मिलन का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि जीव संसार में रहते हुए अपने मूल स्रोत (परमात्मा) को नहीं पहचान पाता, इसीलिए वह दुखी है। श्रीमद्भागवत कथा माल्हनपार जैसे आयोजन हमें आत्म-दर्शन कराने का माध्यम बनते हैं।
भक्ति और नृत्य का अद्भुत संगम
कथा के बीच में जब सौरभ ऋषि जी ने “बदलेगा किस्मत सांवरिया” भजन गाया, तो पूरा अस्पताल प्रांगण भक्ति के उल्लास में डूब गया। श्रद्धालु अपने स्थानों पर खड़े होकर नृत्य करने लगे और ‘जय श्री कृष्ण’ के जयकारों से वातावरण गुंजायमान हो उठा। ऋषि जी ने स्पष्ट किया कि ज्ञान, धन या प्रतिष्ठा केवल संचय के लिए नहीं, बल्कि परमात्मा की प्राप्ति के साधन होने चाहिए।
यजमान और समिति की सक्रियता
कथा के मुख्य यजमान शिवशंकर सिंह ने सपरिवार पोथी पूजन और व्यास पूजन संपन्न किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में ऋषि सेवा समिति के धर्मेन्द्र यादव, सूर्यमणि तिवारी, त्रिपुरारी सिंह, सुरेन्द्र जायसवाल, केशभान तिवारी, वशिष्ठ नारायण शुक्ल, उपेन्द्र राम त्रिपाठी, अमरेन्द्र मौर्य, बुद्धिराम शुक्ल और रामजीत सोनकर सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने अपनी सेवाएं दीं। अंत में प्रभु की भव्य आरती उतारी गई और प्रसाद वितरण किया गया।
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