नई दिल्ली: 10 फरवरी 2026
भारतीय राजनीति के गलियारों में संवैधानिक संस्थाओं और संसदीय परंपराओं को लेकर घमासान तेज हो गया है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने स्पष्ट कर दिया है कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के विरुद्ध महाभियोग की अपनी मांग से पीछे हटने वाली नहीं है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए इस मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि जहाँ टीएमसी एक तरफ हमलावर है, वहीं दूसरी तरफ उसने लोकसभा स्पीकर के पद को लेकर चल रहे विवाद पर विपक्षी गुट को ‘संयम’ और ‘मर्यादा’ बनाए रखने की सलाह दी है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की मांग क्यों?
टीएमसी लंबे समय से निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाती रही है। पार्टी का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में आयोग का झुकाव सत्तापक्ष की ओर अधिक रहा है। टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि हालिया चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन और ईवीएम संबंधी शिकायतों पर आयोग का रवैया पक्षपातपूर्ण था।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, टीएमसी अब संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव लाने के लिए अन्य विपक्षी दलों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। टीएमसी का मानना है कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता बचाने के लिए यह कदम उठाना अब अनिवार्य हो गया है।
स्पीकर विवाद: आक्रामक रुख के बीच ‘संयम’ का संदेश
जहाँ एक तरफ टीएमसी मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर बेहद आक्रामक है, वहीं लोकसभा स्पीकर के पद को लेकर चल रहे हालिया विवाद पर पार्टी का नजरिया थोड़ा अलग है। विपक्ष के कुछ दलों द्वारा स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोलने की खबरों के बीच टीएमसी ने ‘संयम’ बरतने का आह्वान किया है।
पार्टी के एक प्रवक्ता ने संकेत दिया कि स्पीकर का पद संसदीय लोकतंत्र की गरिमा का प्रतीक है। टीएमसी का मानना है कि हर मुद्दे पर टकराव की स्थिति लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। पार्टी ने सुझाव दिया है कि स्पीकर पद से जुड़ी असहमतियों को सदन के भीतर आपसी बातचीत और संसदीय नियमों के तहत ही सुलझाया जाना चाहिए, न कि इसे सार्वजनिक विवाद का केंद्र बनाया जाए।

विपक्षी एकता के भीतर अलग सुर?
टीएमसी का यह दोहरा स्टैंड एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमला और दूसरी तरफ स्पीकर विवाद पर संयम—राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका रहा है। इसे ममता बनर्जी की सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। टीएमसी खुद को एक ऐसी पार्टी के रूप में पेश करना चाहती है जो केवल विरोध के लिए विरोध नहीं करती, बल्कि जहाँ जरूरत हो वहाँ संवैधानिक मर्यादाओं का पालन भी करती है।Gpn Disclaimer
चुनाव आयोग और निष्पक्षता का सवाल
मुख्य चुनाव आयुक्त के महाभियोग का मुद्दा केवल टीएमसी तक सीमित नहीं है। कई अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी समय-समय पर चुनाव आयोग की भूमिका पर संदेह व्यक्त किया है। टीएमसी का कहना है कि अगर चुनाव प्रणाली पर से जनता का विश्वास उठ गया, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी। इसलिए, महाभियोग को वे एक दंडात्मक कार्रवाई के बजाय एक ‘सुधारात्मक कदम’ के रूप में देख रहे हैं।
सरकार का रुख और संवैधानिक अड़चनें
वहीं दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने टीएमसी की इन मांगों को निराधार और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने वाला बताया है। जानकारों का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग चलाना एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो वर्तमान अंकगणित को देखते हुए टीएमसी के लिए एक बड़ी चुनौती है।
निष्कर्ष
टीएमसी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के महाभियोग पर अड़ना और स्पीकर विवाद पर संयम की बात करना भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों को दर्शाता है। आने वाले संसदीय सत्र में यह मुद्दा गरमाने की पूरी संभावना है। क्या टीएमसी अन्य विपक्षी दलों को इस महाभियोग प्रस्ताव के लिए एकजुट कर पाएगी? और क्या स्पीकर विवाद पर उनकी ‘संयम’ की सलाह को अन्य दल स्वीकार करेंगे? ये ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर भविष्य की गर्त में है।
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