यह रिपोर्ट बृजनाथ तिवारी की लिखी हुई है
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में लागू किए गए इक्विटी रेगुलेशन एक्ट 2026 को लेकर विधिक जगत में विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की गोला तहसील स्थित कलक्ट्रेट बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं ने इस कानून के प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन तहसीलदार को सौंपा। अधिवक्ताओं का तर्क है कि समानता के नाम पर लाया गया यह अधिनियम शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव और सामाजिक वैमनस्य का कारण बन सकता है।
बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रंतिदेव मिश्र के नेतृत्व में अधिवक्ताओं ने एकजुट होकर इस कानून के संभावित दुष्परिणामों के प्रति सरकार और प्रशासन को आगाह किया है।

इक्विटी रेगुलेशन एक्ट और अधिवक्ताओं की प्रमुख आपत्तियां
विदित हो कि यूजीसी द्वारा पारित यह अधिनियम बीते 15 जनवरी से देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रभावी कर दिया गया है। अधिवक्ताओं द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में इस कानून के कई बिंदुओं को विवादास्पद बताया गया है:
- सामाजिक समरसता पर खतरा: अधिवक्ताओं का कहना है कि अधिनियम में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के प्रति आवश्यकता से अधिक उदारता दिखाई गई है, जिससे कैंपस के भीतर छात्रों के बीच आपसी दूरियां बढ़ सकती हैं।
- कानून के दुरुपयोग की आशंका: ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि इस कानून के तहत एक विशेष वर्ग को ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जिनका उपयोग कर अन्य वर्गों के विद्यार्थियों को व्यक्तिगत रंजिश के कारण आपराधिक मामलों में फंसाया जा सकता है।
- प्रतिस्पर्धा में बाधा: अधिवक्ताओं के अनुसार, इस प्रकार के विशेष प्रावधान मेधावी छात्रों की प्रतिस्पर्धा क्षमता को प्रभावित करेंगे। केवल आरोप के आधार पर एफआईआर दर्ज होने से मेधावी छात्रों का शैक्षणिक करियर और भविष्य पूरी तरह बर्बाद हो सकता है।
जांच समितियों की निष्पक्षता पर सवाल
अधिवक्ताओं ने ज्ञापन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी बिंदु उठाया है। उनका कहना है कि इस एक्ट के तहत गठित होने वाली जांच समितियों में यदि सभी सदस्य एक ही विशेष वर्ग से होंगे, तो निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती।
- मानसिक उत्पीड़न: पक्षपाती जांच से छात्रों का मानसिक उत्पीड़न होने की संभावना है।
- शिक्षा से वंचित होना: कानूनी उलझनों के कारण छात्र नियमित शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से दूर हो सकते हैं।
- हीनभावना का जन्म: अधिवक्ताओं ने आशंका जताई है कि ऐसे प्रावधानों से बच्चों के मन में हीनभावना और समाज में असंतोष की भावना बलवती होगी।
राष्ट्रपति से अधिनियम वापस लेने की अपील
कलक्ट्रेट बार एसोसिएशन गोला ने उपजिलाधिकारी (SDM) के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को भेजे गए ज्ञापन में पुरजोर मांग की है कि इस इक्विटी रेगुलेशन एक्ट को तत्काल वापस लिया जाए। अधिवक्ताओं का समूह इस बात को लेकर चिंतित है कि अधिवक्ता वर्ग भी समाज का हिस्सा होने के नाते इन दुष्परिणामों से अछूता नहीं रहेगा। उनकी मांग है कि शैक्षणिक संस्थानों में ऐसा वातावरण बना रहना चाहिए जहाँ विद्यार्थी बिना किसी भेदभाव और भय के शांतिपूर्ण ढंग से शिक्षा ग्रहण कर सकें।
ज्ञापन सौंपने के दौरान आमोद गौड़, अरुण मिश्र, गणेश शंकर भारती, सुनील तिवारी, रामलखन राय, रविंद्र दुबे, गिरिजेश शाही और श्रीनिवास पांडेय समेत भारी संख्या में अधिवक्ता उपस्थित रहे।
निष्कर्ष: क्या होगा सरकार का रुख?
यूजीसी के इस नए नियम पर उठा यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है। जहाँ एक ओर यूजीसी इसे समावेशी शिक्षा की ओर एक कदम बता रहा है, वहीं विधिक और बौद्धिक वर्ग इसके क्रियान्वयन के तरीकों को लेकर आशंकित है। अब देखना यह होगा कि राष्ट्रपति कार्यालय और शिक्षा मंत्रालय इन आपत्तियों पर क्या संज्ञान लेते हैं और क्या इस अधिनियम के प्रावधानों में कोई संशोधन किया जाता है।
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