बिहार की राजनीति में ‘पावर गेम’ अब केवल कुर्सी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह नेताओं के साथ चलने वाले कमांडो और सुरक्षाकर्मियों की संख्या में भी दिखने लगा है। 22 जनवरी 2026 को जारी राज्य सरकार के नए आदेश के अनुसार, सत्ता पक्ष के कई शीर्ष नेताओं की सुरक्षा को उच्चतम स्तर पर पहुँचा दिया गया है, जबकि विपक्षी खेमे के प्रमुख चेहरों की सुरक्षा में भारी कटौती की गई है। इस फैसले ने राज्य में एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है, जहाँ विपक्ष इसे ‘सियासी बदले’ की भावना बता रहा है।

भाजपा नेताओं को मिली ‘अभेद्य’ Z श्रेणी की सुरक्षा
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भाजपा की प्रचंड जीत और उसके बाद सांगठनिक बदलावों का असर सुरक्षा व्यवस्था पर साफ दिख रहा है।
- नितिन नबीन (भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष): हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुए बिहार के कद्दावर नेता नितिन नबीन को अब ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई है। उन्हें यह सुरक्षा पूरे देश में मिलेगी और सीआरपीएफ (CRPF) के कमांडो उनके साथ तैनात रहेंगे।
- अन्य दिग्गज: केंद्रीय मंत्री ललन सिंह, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे को भी ‘Z’ श्रेणी का सुरक्षा कवर दिया गया है। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की सुरक्षा भी बढ़ाकर Y+ कर दी गई है।
तेजस्वी यादव की सुरक्षा में बड़ी कटौती
बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राजद के सबसे बड़े चेहरे तेजस्वी यादव के लिए यह फैसला एक बड़े झटके की तरह है।
- Z से Y+ पर आए: तेजस्वी यादव को पहले राज्य सरकार की ओर से ‘Z’ श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त थी, जिसे अब घटाकर ‘Y+’ श्रेणी कर दिया गया है।
- कर्मियों की संख्या घटी: ‘Y+’ श्रेणी में सुरक्षाकर्मियों की संख्या ‘Z’ श्रेणी के मुकाबले काफी कम होती है। अब उनके पास पहले जैसे कमांडो का दस्ता नहीं होगा।
- सियासी आरोप: राजद समर्थकों का कहना है कि नेता प्रतिपक्ष की लोकप्रियता से घबराकर सरकार उनकी सुरक्षा कम कर रही है, ताकि उनकी आवाजाही को प्रभावित किया जा सके।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं की सुरक्षा छीनी गई
इस फेरबदल में सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस और राजद के कुछ वरिष्ठ नेताओं को हुआ है, जिनकी सरकारी सुरक्षा पूरी तरह से वापस ले ली गई है।
- कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष: बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष राजेश राम की पुलिस सुरक्षा वापस ले ली गई है।
- पूर्व विधानसभा अध्यक्ष: राजद नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के पास से भी सरकारी सुरक्षा हटा ली गई है।
- मदन मोहन झा: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मोहन झा की सुरक्षा में भी यही कटौती देखने को मिली है।
सरकार का तर्क: ‘थ्रेट परसेप्शन’ या ‘राजनीति’?
गृह विभाग और राज्य स्तरीय सुरक्षा समीक्षा समिति का कहना है कि यह निर्णय पूरी तरह से ‘थ्रेट परसेप्शन’ (खतरे के आकलन) और खुफिया विभाग की रिपोर्ट पर आधारित है। सरकार के अनुसार, वीआईपी सुरक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि जरूरत के आधार पर दी जाने वाली सेवा है।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि सत्ता में आने के बाद पार्टियां अक्सर अपने कैडरों का मनोबल बढ़ाने के लिए अपने नेताओं का सुरक्षा घेरा बढ़ाती हैं। नितिन नबीन का भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना बिहार के लिए गौरव की बात है, ऐसे में उन्हें उच्चतम स्तर की सुरक्षा देना प्रोटोकॉल का हिस्सा माना जा रहा है। वहीं, विपक्ष इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बता रहा है।
निष्कर्ष: सुरक्षा पर छिड़ा घमासान
बिहार में सुरक्षा श्रेणियों में हुआ यह बदलाव आने वाले दिनों में और भी गरमा सकता है। विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है, वहीं सत्ता पक्ष इसे केवल प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तेजस्वी यादव और कांग्रेस नेता इस फैसले के खिलाफ उच्चाधिकारियों या न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं। फिलहाल, पटना की सड़कों पर अब भाजपा नेताओं के साथ चलने वाले काफिले पहले से कहीं अधिक भव्य और सुरक्षित नजर आएंगे।













