यह रिपोर्ट बृजनाथ तिवारी की लिखी हुई है
शेर-ओ-शायरी की दुनिया में ‘फिराक गोरखपुरी’ एक ऐसा नाम है, जिसने उर्दू साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाई। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की गोला तहसील के बनवारपार गांव में 28 अगस्त 1896 को जन्मे रघुपति सहाय (जिन्हें दुनिया फिराक के नाम से जानती है) ने अपनी कलम से जो जादू बिखेरा, उसकी गूंज आज भी अदबी हल्कों में सुनाई देती है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस शायर ने गोरखपुर का नाम दुनिया भर में रोशन किया, आज उसी के शहर और गांव में उनकी यादें दम तोड़ रही हैं।
मेधावी छात्र से स्वतंत्र, ता संग्राम सेनानी तक का सफर
रघुपति सहाय के पिता मुंशी गोरख प्रसाद सहाय स्वयं फारसी के जाने-माने शायर और वकील थे। फिराक की शिक्षा बेहद उच्च कोटि की रही।

- शिक्षा: 1919 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।
- आईसीएस का त्याग: उसी वर्ष उन्होंने प्रतिष्ठित आईसीएस (ICS) की परीक्षा पास की, लेकिन राष्ट्रप्रेम और व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने इस ‘शाही नौकरी’ को ठुकरा दिया और देश सेवा का मार्ग चुना।
- अध्यापन: वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता रहे और अंग्रेजी, उर्दू व हिंदी भाषा पर उनका समान अधिकार था।
लक्ष्मी निवास: कभी पूर्वांचल का ‘आनंद भवन’ था यह घर
गोरखपुर के तुर्कमानपुर मोहल्ले में स्थित उनका घर ‘लक्ष्मी निवास’ कभी बौद्धिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र हुआ करता था। इसे पूर्वांचल का ‘आनंद भवन’ कहा जाता था। यहाँ पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रेमचंद, अली बंधु, जोश मलीहाबादी और शिब्बन लाल सक्सेना जैसी महान हस्तियों का जमावड़ा लगा रहता था।

हालाँकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था। पिता की मृत्यु के बाद कर्ज चुकाने, भाइयों की पढ़ाई और बहनों की शादी की जिम्मेदारी रघुपति सहाय के कंधों पर आ गई। इस भारी बोझ को उठाने के लिए उन्हें अपना प्रिय ‘लक्ष्मी निवास’ बेचना पड़ा। बाद में यह मकान महादेव प्रसाद तुलस्यान ने खरीदा और वर्तमान में इसका एक हिस्सा सरस्वती शिशु मंदिर के रूप में संचालित है।
अपने ही शहर में बेगाने हुए फिराक
- आज फिराक गोरखपुरी की विरासत सरकारी फाइलों और उपेक्षा की धूल में दबी हुई है।खंडहर बनती जन्मस्थली: बनवारपार स्थित वह मकान जहाँ फिराक ने पहली सांस ली थी, आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। शासन-प्रशासन की अनदेखी के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर ढहने की कगार पर है।
- जुमला साबित हुआ कम्युनिटी सेंटर: सरकार ने फिराक की याद में 61 लाख रुपये की लागत से एक कम्युनिटी सेंटर बनाने की घोषणा की थी, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी यह प्रस्ताव केवल एक ‘सरकारी जुमला’ बनकर रह गया है।
- पर्यटन स्थल की कमी: नई पीढ़ी को फिराक के साहित्य और उनके योगदान से रूबरू कराने के लिए गोरखपुर में कोई पुख्ता संग्रहालय या संस्थान नहीं है।
निष्कर्ष: क्या लौटेगी फिराक की खोई विरासत?
फिराक गोरखपुरी जैसे महान साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का अपने ही घर में बेगाना होना समाज और सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
यदि समय रहते उनके पैतृक आवास को संरक्षित नहीं किया गया और उनकी याद में घोषित योजनाओं को धरातल पर नहीं उतारा गया, तो आने वाली नस्लें केवल किताबों में ही उनका नाम पढ़ पाएंगी। गोरखपुर के साहित्य प्रेमियों की मांग है कि फिराक के घर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए।













